दिवाली रौशनी का त्यौहार है पटाखों का नहीं

उच्चत्तम न्यायलय द्वारा पटाखों पर लगाए गए प्रतिबन्ध को सांप्रदायिक रंग देकर हम भारतीयों ने बेवकूफी की एक नयी मिसाल कायम की है। हम सब जानते हैं कि पिछले साल दिवाली के बाद किस तरह 5-6 दिनों तक दिल्ली से धुआं छंटा नहीं था और उस धुंए से सभी दिल्लीवासियों को बहुत मुश्किलें झेलनी पड़ी थी। दमे के मरीजों के लिए क्या मुसीबत हुई होगी वो तो खैर जाने ही दो।

पिछले साल दिवाली के बाद किस तरह 5-6 दिनों तक दिल्ली से धुआं छंटा नहीं था और उस धुंए से सभी दिल्लीवासियों को बहुत मुश्किलें झेलनी पड़ी थी।

और अब जब उच्चत्तम न्यायालय ने हमारे वातावरण और हमारे स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए पटाखों पर बैन लगाने का निर्णय लिया तो अब हम में से बहुतों को ये भा नहीं रहा। सभी जानते हैं कि ये निर्णय क्यूं लिया गया और किसी को शायद कोई परेशानी भी नहीं होती लेकिन किसी ने बीच में ऊँगली कर दी और हमको ये एहसास दिला दिया की दिवाली पे पटाखे बंद होने से हिन्दू धर्म को खतरा है और अगर धर्म को बचाना है तो पटाखे तो जरूर बजाने हैं। धरती माँ गयी भाड़ में, वातावरण भी गया भाड़ में। जब इमरजेंसी पड़ेगी तबकी तब देखेंगे। और वायु प्रदूषण से जो परेशान होंगे या जो परलोक भी सिधार जायेंगे उनकी वो ही जाने। हमें क्या पड़ी है। हमारे लिए तो पटाखे ज्यादा जरूरी हैं क्योंकि वो हमारे धर्म का प्रतीक है। आपको पता ही होगा जब भगवान् श्री राम 14 सालों के वनवास के बाद घर वापिस पहुंचे तो अयोध्या वासियों ने पटाखे फोड़ के उनका स्वागत किया था। तो अब जब पटाखों पे प्रतिबन्ध लगाया जा रहा है तो जरूर इसमें हमारे हिन्दू धर्म के खिलाफ कोई षड़यंत्र है। क्या कहा? पटाखे उस वक़्त नहीं थे? तो ये दिवाली और पटाखों का कनेक्शन कब हुआ? पता नहीं पर इतना जरूर है कि ये पटाखे चलाने की रिवाज़ बहुत पुरानी नहीं है। मतलब कुछ सौ वर्षों पहले दिवाली एक रौशनी का त्यौहार था और हमारे भगवान् श्री राम की घर वापसी का प्रतीक था

आपको पता ही होगा जब भगवान् श्री राम 14 सालों के वनवास के बाद घर वापिस पहुंचे तो अयोध्या वासियों ने पटाखे फोड़ के उनका स्वागत किया था। तो अब जब पटाखों पे प्रतिबन्ध लगाया जा रहा है तो जरूर इसमें हमारे हिन्दू धर्म के खिलाफ कोई षड़यंत्र है।

शायद इस प्रतिबन्ध से किसी को कोई दिक्कत नहीं होती लेकिन क्योंकि जब बकरीद के दिन मुसलमानों द्वारा बकरे काटने पर कोई रोक नहीं तो हमारे पटाखे पर कैसे रोक लग गयी ये हजम करना थोड़ा मुश्किल हो रहा है हम लोगों को। अचानक से अब उच्चत्तम न्यायलय हिन्दू विरोधी हो गया है और मुसलमानों का पक्षधर हो गया है, वही उच्चत्तम न्यायलय जिसने अभी कुछ हफ्ते पहले ही “तीन तलाक” पर रोक लगायी थी। हम हुन्दुओं को वो निर्णय खूब भाया था। इसलिये नहीं क्योंकि मुस्लिम महिलाओं के मौलिक अधिकार की रक्षा के लिए जरूरी था बल्कि इसलिए क्योंकि उसमें इस्लाम की एक बुराई को संवैधानिक तौर पे गलत ठहराया गया और भला इस बात से ज्यादा सुकून और किस चीज से मिल सकता है। हिन्दू हो या मुसलमान हमको दूसरे धर्म को निचा दिखाने में जो मजा और सुकून मिलता है वो कहीं और नहीं। इस मामले में बहुत से भारतीय मुसलमान भी कम नहीं हैं पर यहाँ बात दीपावली और पटाखों की हो रही है इसलिए मैं अभी हिंदुओं की, अपनी बात कर रहा हूँ।

हिन्दू हो या मुसलमान हमको दूसरे धर्म को निचा दिखाने में जो मजा और सुकून मिलता है वो कहीं और नहीं।

अगर हमें लगता है कि दूसरे संप्रदाय में कुछ बुराइयां है तो उसको सही करने की जिम्मेदारी उस संप्रदाय के लोगों की है या प्रशासन की है। दूसरे संप्रदाय में कोई बुराई है तो इसका ये मतलब नहीं कि हमें अपनी कमियां छुपाने का लाइसेंस मिल गया। एक जागरूक और समझदार नागरिक होने के नाते हमारा ये फ़र्ज़ है कि हम दूसरों पे उंगलियां उठाने के बजाय अपनी कमियों को दूर करने की कोशिश करें। और अगर वो नहीं कर सकते तो कम से कम अगर कानूनन इसपे रोक लग रही है तो हम उसका आदर करें। न कि दूसरे संप्रदाय की कमियां गिनाने लग जाएं।

समय की मांग का आदर करना हमारा कर्तव्य है। ये हम हिन्दुओं के लिए गौरव की बात होगी की अपनी प्रकृति और धरती माँ की रक्षा के लिए हम अपने इस रिवाज को त्याग दें।

हाँ मैं मानता हूँ कि पटाखों और दिवाली का सम्बन्ध कई सालों पुराना है और हमने हमेशा से दिवाली को इसी तरह मनाया है और इसलिये पटाखों के बिना दिवाली की कल्पना करना हमारे लिए मुश्किल है। लेकिन समय की मांग का आदर करना हमारा कर्तव्य है। ये हम हिन्दुओं के लिए गौरव की बात होगी की अपनी प्रकृति और धरती माँ की रक्षा के लिए हम अपने इस रिवाज को त्याग दें। और इस से भी अच्छी एक ये बात होगी कि हम दिवाली को एक शुद्ध तरीके से मनाएं। दिवाली रौशनी का त्यौहार है पटाखों का नहीं। इसलिए एक सच्चे हिन्दू की अपने सभी हिन्दू साथियों से विनती है कि आओ घी के दिए जला के इस वातावरण को शुद्ध करें न कि पटाखों के धुएं से इसे दूषित।

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